The Building Blocks of Jyotish
आपने ज्योतिष का दर्शन समझा। इसका इतिहास जाना। कर्म सिद्धान्त को समझा।
अब एक व्यावहारिक प्रश्न —
जब आप पहली बार एक कुंडली देखते हैं — तो उसमें क्या होता है?
वे चिह्न, वे अंक, वे नाम — यह सब क्या हैं?
यह लेख उसी का उत्तर है। यह कोई गहन तकनीकी विवेचन नहीं है — यह एक मानचित्र है। एक परिचय। जिसे पढ़कर आप जान सकें कि ज्योतिष की भाषा के मूल शब्द क्या हैं — और वे आपस में कैसे जुड़े हैं।
ज्योतिष का दृष्टिकोण — भूकेंद्रीय दृष्टि
ज्योतिष को समझने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि ज्योतिष आकाश को कहाँ से देखता है।
आधुनिक खगोलशास्त्र सूर्यकेंद्रीय है — अर्थात् सूर्य केंद्र में है और पृथ्वी उसके चारों ओर घूमती है।
ज्योतिष भूकेंद्रीय (Geocentric) है — अर्थात् पृथ्वी केंद्र में है। आकाश में जो कुछ भी दिखता है — सूर्य, चंद्रमा, ग्रह, नक्षत्र — वह सब पृथ्वी पर खड़े एक मनुष्य की दृष्टि से देखा जाता है।
यह वैज्ञानिक अज्ञानता नहीं है। यह एक conscious choice है।
ज्योतिष का प्रश्न यह नहीं है कि ब्रह्मांड का केंद्र कहाँ है। ज्योतिष का प्रश्न यह है — इस पृथ्वी पर, इस स्थान पर, इस क्षण में जन्मे इस मनुष्य पर आकाश का क्या प्रभाव है?
और उस प्रश्न के लिए — पृथ्वी ही केंद्र है। मनुष्य ही केंद्र है।
यही भूकेंद्रीय दृष्टि की गहराई है।
स्थिर और चर — ज्योतिष की दो श्रेणियाँ
ज्योतिष के आकाश में दो प्रकार की चीज़ें हैं —
जो स्थिर हैं — और जो चलती हैं।
राशि और नक्षत्र — स्थिर पृष्ठभूमि
राशियाँ और नक्षत्र स्थिर हैं।
राशिचक्र के 360 अंश — बारह राशियाँ और सत्ताईस नक्षत्र — यह आकाश की एक स्थायी पृष्ठभूमि है। यह नहीं बदलती। मेष राशि आज भी वहीं है जहाँ हज़ारों वर्ष पहले थी। अश्विनी नक्षत्र आज भी वहीं है।
यह पृष्ठभूमि एक रंगमंच है — जिस पर ग्रह अपना नाटक खेलते हैं।
ग्रह — चलती शक्तियाँ
ग्रह चलते हैं — निरंतर।
सभी ग्रह प्रति पल एक राशि से दूसरी की ओर बढ़ते हैं — किसी की गति तीव्र है, किसी की मंद। चंद्रमा लगभग सवा दो दिन में ।शनि ढाई वर्ष में एक राशि में रहता है।
यह गतिशील ग्रह उस स्थिर पृष्ठभूमि — राशि और नक्षत्र — पर विभिन्न स्थितियाँ बनाते रहते हैं।
और इन्हीं स्थितियों से — जीवन की घटनाएँ, ऋतुएँ, तिथियाँ, और महायोग बनते हैं।
ग्रह-संयोग से बनते हैं — योग, ऋतु, तिथि, पर्व
यह ज्योतिष का सबसे व्यावहारिक और सबसे सुंदर पहलू है।
हम जो त्योहार मनाते हैं, जो व्रत रखते हैं, जो मुहूर्त निकालते हैं — यह सब किसी परंपरा की मनमानी नहीं है। यह सब ग्रहों की विशेष स्थितियों पर आधारित है।
तीन उदाहरणों से समझते हैं —
मकर संक्रांति — सूर्य का मकर में प्रवेश
मकर संक्रांति तब होती है जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है।
यह वह क्षण है जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होता है — अर्थात् उत्तर की ओर बढ़ने लगता है। दिन बड़े होने लगते हैं। शीत का अवसान और नई ऊर्जा का आगमन।
इसीलिए इसे देवताओं का दिन कहा गया — क्योंकि उत्तरायण देवताओं का काल है।
उत्तरायणे हि देवानां दिवसो दक्षिणायने।
— महाभारत
तिल-गुड़, खिचड़ी, पतंग — यह सब उस cosmic transition के उत्सव हैं। यह त्योहार किसी राजा ने नहीं बनाया — यह सूर्य की गति ने बनाया।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा — नववर्ष का आरंभ
हिंदू नववर्ष — गुड़ी पड़वा, उगादि — चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है।
यह वह क्षण है जब —
सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है — अपनी उच्च राशि के निकट। चंद्रमा नया होता है — शुक्ल पक्ष का आरंभ। ऋतु वसंत की होती है — प्रकृति नई पत्तियों से भर जाती है।
तीनों का संयोग — सूर्य, चंद्र, और ऋतु — एक साथ नई शुरुआत का संकेत देते हैं। इसीलिए यह नववर्ष है। यह संयोग प्रत्येक वर्ष होता है — और प्रत्येक वर्ष एक नया चक्र आरंभ होता है।
अक्षय तृतीया — जब सूर्य और चंद्र दोनों उच्च हों
अक्षय तृतीया शायद ज्योतिष की सबसे सुंदर खगोलीय घटना का उत्सव है।
यह वैशाख मास की शुक्ल तृतीया को होती है। इस दिन —
सूर्य मेष राशि में होता है — जो उसकी उच्च राशि है। चंद्रमा वृष राशि में होता है — जो उसकी उच्च राशि है।
दोनों प्रमुख ग्रह — सूर्य और चंद्र — एक साथ अपनी-अपनी उच्च राशि में। यह संयोग वर्ष में केवल एक बार और केवल इसी अवधि में संभव है।
इसीलिए इस दिन को अक्षय — अर्थात् जो कभी क्षय न हो — कहा गया। जो भी शुभ कार्य इस दिन आरंभ किया जाए, वह फलता रहता है।
यह कोई मान्यता नहीं — यह ग्रह-गणित है।
इन तीन उदाहरणों से एक बात स्पष्ट हो जाती है —
हमारे पर्व, व्रत, और मुहूर्त — यह सब ग्रहों की भाषा में लिखे हुए संदेश हैं। हमारे पूर्वजों ने आकाश को पढ़ा — और उसे जीवन के उत्सव में बदल दिया।
ज्योतिष का आधार — पाँच तत्त्व
अब उस नींव की ओर जो कुंडली को पठनीय बनाती है।
ज्योतिष की पूरी इमारत पाँच मूलभूत अवधारणाओं पर खड़ी है —
ग्रह, राशि, भाव, नक्षत्र, और दशा।
१. ग्रह — The Planets
ग्रह वे cosmic forces हैं जो जीवन के विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारतीय ज्योतिष में नवग्रह हैं — नौ ग्रह। इनमें सूर्य और चंद्रमा भी हैं — जो खगोलशास्त्र में ग्रह नहीं, पर ज्योतिष में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। और राहु-केतु हैं — चंद्रमा के orbit के दो छाया-बिंदु।
| ग्रह | कारकत्व |
|---|---|
| सूर्य | आत्मा, पिता, अधिकार, स्वास्थ्य |
| चंद्रमा | मन, माता, भावना, स्मृति |
| मंगल | साहस, ऊर्जा, भाई, भूमि |
| बुध | बुद्धि, वाणी, व्यापार, गणित |
| बृहस्पति | ज्ञान, गुरु, संतान, धर्म |
| शुक्र | प्रेम, सौंदर्य, वैवाहिक सुख, कला |
| शनि | कर्म, अनुशासन, दीर्घायु, सेवा |
| राहु | महत्त्वाकांक्षा, भ्रम, विदेश, नवीनता |
| केतु | वैराग्य, आध्यात्म, मोक्ष, पूर्वजन्म |
२. राशि — The Signs
राशिचक्र के 360 अंशों को बारह भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक भाग 30 अंश का — यही बारह राशियाँ हैं। यह स्थिर हैं — आकाश की स्थायी पृष्ठभूमि।
| क्र. | राशि | अंग्रेज़ी | स्वभाव | स्वामी |
|---|---|---|---|---|
| १ | मेष | Aries | अग्नि, चर | मंगल |
| २ | वृष | Taurus | पृथ्वी, स्थिर | शुक्र |
| ३ | मिथुन | Gemini | वायु, द्विस्वभाव | बुध |
| ४ | कर्क | Cancer | जल, चर | चंद्र |
| ५ | सिंह | Leo | अग्नि, स्थिर | सूर्य |
| ६ | कन्या | Virgo | पृथ्वी, द्विस्वभाव | बुध |
| ७ | तुला | Libra | वायु, चर | शुक्र |
| ८ | वृश्चिक | Scorpio | जल, स्थिर | मंगल |
| ९ | धनु | Sagittarius | अग्नि, द्विस्वभाव | बृहस्पति |
| १० | मकर | Capricorn | पृथ्वी, चर | शनि |
| ११ | कुंभ | Aquarius | वायु, स्थिर | शनि |
| १२ | मीन | Pisces | जल, द्विस्वभाव | बृहस्पति |
३. भाव — The Houses
यदि राशियाँ आकाश का नक्शा हैं — तो भाव जीवन का नक्शा हैं। कुंडली में बारह भाव होते हैं — और प्रत्येक भाव जीवन के एक विशेष क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।
| भाव | विषय |
|---|---|
| प्रथम | लग्न — व्यक्तित्व, शरीर, आत्म-स्वरूप |
| द्वितीय | धन, परिवार, वाणी |
| तृतीय | भाई-बहन, साहस, यात्रा, संचार |
| चतुर्थ | माता, घर, सुख, भूमि |
| पंचम | संतान, बुद्धि, पूर्वपुण्य, प्रेम |
| षष्ठ | रोग, शत्रु, ऋण, सेवा |
| सप्तम | विवाह, साझेदारी, व्यापार |
| अष्टम | आयु, रहस्य, उत्तराधिकार, परिवर्तन |
| नवम | भाग्य, धर्म, गुरु, दीर्घ यात्रा |
| दशम | कर्म, व्यवसाय, यश, पिता |
| एकादश | लाभ, मित्र, इच्छापूर्ति |
| द्वादश | व्यय, विदेश, मोक्ष, एकांत |
जन्म के समय जो राशि पूर्व क्षितिज पर उदय हो रही थी — वह लग्न बनती है। और वही प्रथम भाव है।
४. नक्षत्र — The Lunar Mansions
राशिचक्र को सत्ताईस नक्षत्रों में भी विभाजित किया गया है। प्रत्येक नक्षत्र 13 अंश 20 कला का। यह भी राशियों की तरह स्थिर हैं।
नक्षत्र भारतीय ज्योतिष की एक विशेष परंपरा है — जो पश्चिमी ज्योतिष में नहीं पाई जाती। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में हो — वह जन्म-नक्षत्र है। इससे विंशोत्तरी दशा का आरंभ-बिंदु निर्धारित होता है।
५. दशा — The Time Periods
कुंडली एक स्थिर चित्र है — जन्म के क्षण का। पर जीवन स्थिर नहीं। दशा वह प्रणाली है जो बताती है कि कुंडली में जो लिखा है — वह कब फलित होगा।
सबसे प्रचलित विंशोत्तरी दशा 120 वर्षों का एक चक्र है —
| ग्रह | दशा-काल |
|---|---|
| सूर्य | 6 वर्ष |
| चंद्र | 10 वर्ष |
| मंगल | 7 वर्ष |
| राहु | 18 वर्ष |
| बृहस्पति | 16 वर्ष |
| शनि | 19 वर्ष |
| बुध | 17 वर्ष |
| केतु | 7 वर्ष |
| शुक्र | 20 वर्ष |
दशा के भीतर अंतर्दशा और प्रत्यंतर्दशा — यह तीन स्तरीय विभाजन समय के फल को अत्यंत सूक्ष्मता से दिखाता है।
६. गोचर — The Transits
दशा के साथ-साथ गोचर — जन्म के बाद भी ग्रह आकाश में चलते रहते हैं। जब ये चलते ग्रह जन्मकुंडली के ग्रहों या भावों पर विशेष स्थिति बनाते हैं — तो उसका फल मिलता है।
दशा भीतरी समय है — कुंडली से निकलता है। गोचर बाहरी समय है — आकाश से आता है।
दोनों को मिलाकर देखना — यही फलित की कला है।
सब कुछ मिलकर — एक कुंडली
जब एक बच्चा जन्म लेता है — उस क्षण आकाश में नौ ग्रह किसी न किसी राशि में हैं। वे राशियाँ जन्म-लग्न के अनुसार बारह भावों में बँट जाती हैं। चंद्रमा जिस नक्षत्र में है — उससे दशा का आरंभ-बिंदु तय होता है।
यह सब मिलकर बनती है — जन्मकुंडली।
अंत में — एक सरल सूत्र
ग्रह बताते हैं क्या — कौन सी शक्तियाँ काम कर रही हैं। राशि बताती है कैसे — उन शक्तियों का स्वभाव क्या है। भाव बताता है कहाँ — जीवन के किस क्षेत्र में। नक्षत्र बताता है किस गहराई में — सूक्ष्म प्रकृति क्या है। दशा बताती है कब — किस समय यह फलित होगा।
और यह सब उस भूकेंद्रीय दृष्टि से देखा जाता है — जहाँ केंद्र में ब्रह्मांड नहीं, आप हैं।
क्योंकि ज्योतिष का अंतिम प्रश्न यही है —
इस पृथ्वी पर, इस स्थान पर, इस क्षण में जन्मे इस मनुष्य का — इस ब्रह्मांड से क्या संबंध है?
यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे।
— उपनिषद् परंपरा
जो पिंड में है — वही ब्रह्मांड में है।
आप और यह आकाश — एक ही हैं।